Rising Yadavs

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Saying that Yadavs are milkmen doesn't work at all because in Sikh dominated area Yadavs won't sell milk . Sikh themselves are serving it . In Noida many Gujjars are selling milk(Milkmen) . In Rajputs area many Rajput are selling milk(Milkmen) . Jaats also sell milk(Milkmen) . So , it is not correct to relate The Yadavs from milk.

The basic occupation of our countrys' people is farming , raising cattles and they are down to Earth .

इस देश में कृष्ण जी का सबसे ज़्यादा दुष्प्रचार हुआ है। एक तरफ कृष्ण जी हैं, जो स्वयं भगवान है, आए दिन लोग उनपर सवाल खड़े कर देते हैं, की उनकी 16,108 रानियाँ थीं, गोपियों के साथ रास लीला करते थे, गोपियों के वस्त्र चुरा लेते थे, पर कोई गहराई में नहीं जाता की ऐसा होता क्यों था?????????????
16,000 औरतों का एक कुटिल राजा ने अफरन कर लिया था, उनको श्री कृष्ण ने ही बचाया परंतु वे सब अत्महत्या कर...ने जा रही थी की अब न तो कोई वर उन्हे स्वीकारेगा ना ही उनके माता- पिता.......................तब श्री कृष्ण ने उन सभी से विवाह किया और उनकी जान बचाई............................
गोपियाँ उनसे प्रेम करती थी, अपना आराध्य मानती थी, और उनके साथ खुशियाँ मनाना चाहती थी, इसी कारण से 'रास-लीला' नृत्य किया जाता था.......
और इन दोनों बातों में सबसे अहम बात ये है की हर रानी के साथ, अथवा हर गोपी के साथ श्री कृष्ण जी का एक रूप होता था................................चाहे वे नृत्य करें, तो हर गोपिका के साथ करते थे और अपनी हर रानी के साथ वे होते थे.........................
जब वे गोपियों के वस्त्र चुराते थे, तब वे मात्र 5-7 वर्ष की आयु के थे, गोपियाँ उनको माखन नहीं खाने देती थी, और वे उनको परेशान करने के लिए उनके वस्त्र चुरा लेते थे........................................अब आज के नास्तिक क्या समझें, की प्रेम भाव क्या होता है? भक्ति किसे कहते हैं? उन्हे तो क्षुब्ध मानसिकता से परिपूर्ण होकर ही इन्सानो से भगवान की तुलना करनी आती है..............................क्या श्री कृष्ण किसी से भी तुलना के लायक हैं?????????????? क्या कोई भी अपने लाखों रूप बना सकता है????????????????????? इसे समझने की अवशयकता है की भगवान की आराधना की जाती है, उनसे तुलना सिर्फ मूर्ख ही करते हैं....................
हरे कृष्ण.........................!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

                                   यादवों' के सन्दर्भ में दिए जाने वाले कुतर्क और उनके तार्किक उत्तर

कुतर्क 1 : भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 'क्षत्रिय' वंश में हुआ था और उनका पालन-पोषण एक ग्वाल परिवार में।

जवाब : श्रीकृष्ण के पिता का नाम राजा 'वासुदेव' और माता का नाम 'देवकी' था। जन्म के पश्चात् उनका पालन-पोषण 'नन्द बाबा' और 'यशोदा' माता के द्वारा हुआ।
महाभारत के अनुसार राजा वासुदेव के पिता का नाम 'राजा सूरसेन' था। 'राजा सूरसेन' के एक भाई का नाम था 'पार्जन्य'.
'पार्जन्य' के नौ पुत्र थे- उपानंद, अभिनंद, नन्द, सुनंद, कर्मानंद, धर्मानंद, धरानंद, ध्रुवनंद और वल्लभ। 'नन्द बाबा' 'पार्जन्य' के तीसरे पुत्र थे।
इस प्रकार राजा वासुदेव और नन्द बाबा चचेरे भाई थे। दोनों ही 'यदुवंशी' क्षत्रिय थे। नन्द बाबा की बाद की पीढियां ही नंदवंशी कहलाई। क्यूँ की ये लोग गौ पालन करते थे इसलिए ग्वाल/अहीर भी कहलाये। जन्म के पश्चात श्रीकृष्ण को कंस से बचाने के लिए ही वासुदेव यमुना नदी को पार कर 'गोकुल' पहुंचे, जहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण को अपने भाई 'नन्द बाबा' के हवाले किया।
'भागवत पुराण' के अनुसार 'नन्द बाबा' के पास नौ लाख गायें थी। उनकी बड़ी ख्याति थी। और वे पूरे गोकुल और नंदगाँव के संरक्षक थे।
कुछ लोग अज्ञानतावश कुतर्क देते है। परन्तु सच यही है की 'श्रीकृष्ण' का जन्म और पालन-पोषण 'यदुवंशी-क्षत्रिय' परिवार में ही हुआ था जो आजकल 'यादव' नामसे जाने जाते है। यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि ग्वाल/अहीर भी यदुवंशी क्षत्रिय वंश से ही ताल्लुक रखते है। कालांतर में वे गौ पालन और संरक्षण में लग गये।

कुतर्क 2 : अहीर यदुवंशी क्षत्रिय नहीं होते।

जवाब: ऊपर यह बात बताया जा चुका है कि ग्वाल और अहीर भी 'यदुवंशी क्षत्रिय' वंश से ही ताल्लुक रखते है।
'अहीर' एक 'प्राकृत' शब्द है जो संस्कृत के 'अभीर' से लिया गया है जिसका अर्थ है 'निडर'.
अपनी निडरता और क्षत्रिय वंश के कारण की इनका नाम 'अहीर' पड़ा। बाद में अहीरों ने अपने साम्राज्य भी स्थापित किये। जिसका उल्लेख भिन्न-भिन्न पुराणों में भी मिलता है।
अंग्रेजी हुकूमत ने अपने राज में जब जाति के आधार पे जनगणना करायी तो 'अहीरों' को Martial Caste के वर्ग में रखा। अग्रेजों ने अहीरों के नाम पे सेना में चार कंपनिया भी बनायीं।
आजकल भारतीय सेना की सबसे सुसज्जित रेजिमेंट 'कुमाओं रेजिमेंट' मुख्य रूप से 'अहीरों को ही भर्ती करती है।

कुतर्क 3: भगवान श्रीकृष्ण 'यादव' नहीं राजपूत थे।

जवाब:यह कुतर्क कभी-कभी वे लोग जिनकी बुद्धिलब्धि(Intelligence Quotient) शुन्य है वो देते है।
श्रीमदभागवत गीता में एक श्लोक है :
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥११- ४१॥
(गीता-अध्याय 11, श्लोक 41)
इस श्लोक में अर्जुन भगवान 'श्रीकृष्ण' को 'यादव' नाम से संबोधित करते है।
राजा 'ययाति' के पांचो पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुहू, अनु और पुरु) को ऋग वेद में 'पाञ्चजन्य' कहा गया है।
गौरतलब है कि 'यदु' ने ही 'यदुवंश' की शुरुवात की थी इसलिए ऋग वेद के अनुसार यदुवंशी(यादव) 'वैदिक क्षत्रिय' है।
'यादव' शब्द का उल्लेख ऋग वेद , गीता तथा भागवत पुराण में भी है।
इसके विपरीत आपको कहीं भी किसी भी धार्मिक पुस्तक में 'सिंह' अथवा 'राजपूत' शब्द नहीं मिलेगा। पहली बार 'राजपूत' शब्द का उल्लेख छठवी शताब्दी (6th Century A.D.) में मिलता है।
लेखकों और शोधकर्ताओं के अनुसार राजपूत विदेशी आक्रमणकारी 'हुन जाति' से संबंध रखते है। यहाँ तक कि 'राजपूतों' का 'वैदिक सनातन धर्म' से भी कोई ताल्लुक नहीं है। छठवी शताब्दी में ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को भारत से ख़तम करने के लिए राजपूतों को सुनियोजित तरीके से 'हिन्दू' धर्म में सम्मलित किया और 'क्षत्रिय' का दर्ज़ा दिया।
अतः ऊपर दिए तर्कों से ये स्पष्ट है की भगवान श्रीकृष्ण का राजपूत शब्द से कोई सम्बन्ध नहीं है।

कुतर्क 4: कुछ प्रान्तों में 'यादव' पिछड़े वर्ग में शामिल है इसलिए वे 'क्षत्रिय' नहीं है।

जवाब: कुछ प्रान्तों में 'यादव' पिछड़े वर्ग में शामिल है। आरक्षण उन वर्गों को दिया गया है जो शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े थे। इसलिए ये वर्ग सरकारी नौकरियों में भी पीछे थे। इनकी भागदारी सुनिश्चित करने के लिए ही इन्हें आरक्षण दिया गया। क्षत्रिय धर्म का पालन करने की वजह से यादवों मेंशारीरिक शिक्षा को महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि यादवों में 'पहलवानी' की परंपरा रही है। इसलिए आज़ादी के समय तक यादव जाति शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ गयी। और इन्हें पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया।
आरक्षण मिलने और नहीं मिलने के आधार पर किसी का वर्ण नहीं बदला जा सकता।
उदाहरण के लिए 'कायस्थ' जाति को ही ले लीजिये। वर्ण-व्यवस्था में कायस्थों को 'शूद्रों' की श्रेणी में रखा गया है, परन्तु इन्हें कोई आरक्षण नहीं मिलता।ये सामान्य वर्ग में है।सामान्य वर्ग में होने के बावजूद भी इन्हें 'ब्राह्मण' या 'क्षत्रिय' वर्ण में शामिल नहीं किया जा सकता।
ऐसे ही उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की दो उपजातियाँ है-नायक और गिरी। इन दोनों जातियों को पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है, और आरक्षण का लाभ दिया जाता है। फिर भी ये जातियाँ ब्राह्मण ही मानी जाएँगी।
ठीक ऐसे ही 'यादव' भी 'वैदिक क्षत्रिय' ही माने जायेंगे। इनका वर्ण नहीं बदला जा सकता।

कुतर्क 5: 'यादव' क्षत्रिय है तो दूसरी क्षत्रिय जातियों में विवाह क्यूँ नहीं करते ?

जवाब: 'वैदिक काल' से लेकर छठवी शताब्दी तक 'यादव' दूसरी क्षत्रिय जातियों में विवाह करते थे। छठवी शताब्दी में विदेशी राजपूतों के आगमन के साथ समाज में कौन असली है और कौन नकली ये पहचान करना मुश्किल हो गया। 'यादव' साधारण तौरपर थोड़े रूढ़िवादी होते है। संशय की स्थिति में दूसरी जाति में विवाह के स्थान पर उन्होंने अपनी जाति में ही विवाह करना उचित समझा।

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